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भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चेतना


✍🏿पार्थसारथि थपलियाल

भारत विश्व का एक विलक्षण देश है जिसने क्रिया की प्रतिक्रिया को जीवन का आधार नही बनाया बल्कि जीवन जीने का समष्टि भाव जिसे सर्वांगीण पहल (Holistic approach) कहें, उसे जीवन का अंग बनाया। मानव का जीवन आधार धरती है। यह भारतीय दृष्टि है कि हमने धरती को माता कहा। यह विचार ऋग्वेद के एक मंत्र में इस प्रकार कहा गया है- “माताभूमि पुत्रोहं पृथिव्या”।। यह भूमि मेरी माता है, मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ। इस धरा पर जीवन जीने वाले लोगों की संस्कृति ही भारतीय संस्कृति है। संस्कृति के बारे में कहा गया है- “सम्यक प्रकारेण क्रियते यस्या उपयोग: सा संस्कृति:”। ग्रामीण जीवन में आज भी यह लोक व्यवहार में है कि सांय काल में पेड़ नही काटना चाहिए एकादशी और अमावस के दिन खेतों में हल नही चलाया जाता है।

हमारे ईर्द-गिर्द का वातावरण हमारे कार्यव्यवहार पर निर्भर करता है। हम अपने परिवार से, संबधियों से, परिचितों से, पशुओं से पक्षियों से, पेड़ पौधों से जितना मैत्रीपूर्ण रहेंगे हमारे आसपास की ऊर्जा उतनी ही सकारात्मक होगी। आज आदमी पद और मद के अहंकार के कारण “मैं ही हूँ” के विचार से जी रहा है। भारतीय संस्कृति में परोपकार को पुण्य और पर पीड़ा को पाप बताया गया है। भारतीय चिंतकों ने “जियो और जीने दो” के उत्तम दर्शन को मानव व्यवहार का अंग बना दिया। जहां सतोगुण प्रधान लोग होंगे वहां सकारात्मक ऊर्जा होगी।

भगवदगीता के सातवें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति के तत्वों के बारे में बताया-
हे अर्जुन! पृथ्वी,जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार यह 8 प्रकार की मेरी प्रकृति है। इस प्रकृति में पर्यावरण हमारे इर्द-गिर्द का वह वातावरण है जो हमें निरंतर प्रभावित करता है। पेड़ हमे जीवन संवर्धक प्राणवायु देते है। लोक जीवन मे कहा जाता है – एक वृक्ष दस पुत्र समान। मत्स्यपुराण में पर्यावरण की महत्ता को समझाने के लिए बताया गया है कि दस कुएं एक पोखर के बराबर, दस पोखर बराबर एक तालाब, दस तालाबों के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक पेड़ होता है। स्वस्ति वाचन में उन सब देवताओं का अभिनंदन किया जाता है, जिनका आशीर्वाद मानवता को मिलता है।

एक सामान्य मनुष्य एक दिन में 21600 सांसें लेता है। शुद्ध वायु को वह फेफड़ों तक पहुंचाता है और अशुद्ध वायु को बाहर छोड़ता है। वायु में चार प्रकार के तत्व शामिल हैं। वायु (हवा) में 80 प्रतिशत भाग हाइड्रोजन, नाइट्रेट्स और सल्फर का होता है, केवल 20 प्रतिशत भाग प्राणवायु (ऑक्सीजन) का होता है। उस 20 प्रतिशत में से 15 प्रतिशत सांस लेने और छोड़ने में निकल जाती है। केवल 5 प्रतिशत ऑक्सीजन हमारे काम आती है। प्राणवायु- यह शरीर मे रक्त संचरण का कार्य करती है। ईश्वर ने प्रकृति में वे वनस्पतियां भी दी हैं जो जीवन को बनाये रखने के लिए हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। एक व्यक्ति एक दिन में औसतन 550 लीटर ऑक्सीजन उपयोग में लाता है। एक सामान्य पेड़ एक दिन में औसतन 230 लीटर ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है।

विश्वभर में बढ़ते उद्योगीकरण, निर्माणकार्य, आशातीत वाहन संचालन, वातानुकूलित उपकरणों का उपयोग, रासायनिक उपकरण, ज़मीन से खनिजों का उत्खनन, जमीन से जल का दोहन, सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जनसंख्या, उस जनसंख्या के लिए जीने की व्यवस्थाएं, वनों की कटाई आदि ऐसे कारण हैं कि वातावरण में आक्सीजन की भारी कमी हो गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे वातावरण में सामान्य जीवन के लिए 33 प्रतिशत भू भाग वनाच्छादित होना चाहिए, जबकि धरा पर 20 प्रतिशत से भी कम वन रह गए हैं। पृथ्वी की परत कहे जाने वाले ओजोन मंडल की परत बहुत पतली पड़ चुकी है। यदि मानव ने समय रहते हुए उचित कदम नही उठाये तो वह दिन दूर नही जब ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमान यकायक बढ़ जाएगा। ध्रुवीय प्रदेशों में तमाम ग्लेशियर पिघल जाएंगे। धरती के जलाशय,जलस्रोत सूख जाएंगे, पशु पक्षी, वनस्पति आदि जल जाएंगे। धरती जलमग्न हो जाएगी। इस स्थिति से बचने के लिए पूरे संसार को प्राचीन भारतीय संस्कृति को समझने की आवश्यकता है।

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