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..तो बीजेपी की लुटिया बीजेपी ही डुबो रही, नहीं तो गैरों में कहां दम है

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✍️अरुणा आर थपलियाल
कांग्रेस का रोग अब भाजपा को भी लग गया है, अपनी लुटिया खुद डुबोने वाला। खासकर उत्तराखंड में। जब तक एनडी तिवारी थे तब तक हरीश रावत और वे दोनो एक – दूसरे को डुबोने की फिराक में पूरी पार्टी को ही डुबोते रहे। एनडी गए तो हरीश रावत एकाधिकार के फेर में पार्टी को डुबो रहे। बाकी कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर दिग्विजय सिंह, मणि शंकर टैप के उस्ताद हैं ही जो ऐन मौकों पर ऐसे बयान मारते हैं कि कभी कभी तो लगता है कि ये लोग कांग्रेस के अंदर विपक्षी दल के बंदे बैठे हैं।

अब भाजपा में भी ऐसा ही होने लगा है शायद। एक नेताजी जो चार साल राजगद्दी पर बैठे, वे अपने महान कारनामों के कारण खुद तो चुनावी पिच पर नहीं हैं, लेकिन पूरी पार्टी का विकेट डाउन करते दीख रहे हैं। जैसे कि ” हम तो डूब चुके तुम्हे भी संग डूबोएंगे सनम” का मंत्र जप रहे हों।
इनके दिल्ली/नागपुर के सयानों ने लगाम न लगाई तो खटीमा वाले नेता की खाट तो गई समझो। बेचारे “अबकी बार 60 पार ” का नारा लगाते ही रह जायेंगे। डोईवाले नेताजी जिस भी गली में जा रहे, एक सीएम पैदा कर आ रहे। खुद की विधायकी वापस पाने की हिम्मत तो दिखा नही पाए, मैदान में जंग शुरू होने से पहले ही भाग निकले, अब दूसरों मेहनत पर पानी फेरने में जुटे हैं। नेताजी की इसे कोई “खुफिया रणनीति समझें या भोलापन” कि हर विधायक उम्मीदवार को सीएम उम्मीदवार बनवा दो, यानी कि बंदा मुगेरीलाल के सपने में डूबा रहे और 10मार्च को……..! या फिर सब सीएम बनने के फेर में एक -दूसरे की टांग खिंचाई में जुट जाएं और 10 मार्च को..…. !!

नेताजी पार्टी के स्टार प्रचारक भी हैं, लेकिन जिसका भी प्रचार करेंगे उसे माइनस ही करेंगे। सुना है कि इसलिए बहुतों ने ऊपर गुजारिश भी की है कि इनको ” बृज का ही आभूषण” बनाए रखो। वैसे भी इन नेताजी ने अपने इलाके को खूब तोहफे दिए हुए हैं, डोईवाला – देहरादून आना -जाना हो तो टोल टैक्स की मिठाई, बालावाला, कुआं वाला, हर्रावाला, नकरौंदा, मियावाला के मस्त जीवन जी रहे लोगों को नगर निगम का लड्डू, प्रॉपर्टी डीलरों की प्लाटिंग को सड़क और आम जन को शटअप, बाकी उनके मीठे बोल तो लोगों के हृदय में बसते हैं ही, आदि आदि। बेचारे गैरोला!!!

पार्टी के बागी भी इन्ही के झुनझूने बता रहे लोग। धन सिंह नेगी, ओम गोपाल रावत, बीर सिंह पंवार, जगबीर भंडारी वगैरा वगैरा।
शायद पुष्कर सिंह धामी को धोबी पछाड़ देने का भी सोचा गया है, पार्टी के किन्ही महारथियों द्वारा। अभी तो बेचारे अकेले दौड़ रहे उम्मीदवारों के पक्ष में वोट मांगने। पौड़ी गए तो सुना कोई भी दुकानदार उनके हुजूर में दर्शन करने बाहर नही निकला। अरे, लोकल सांसद तीरथ सिंह रावत साथ होते, कुछ नही तो निशंक- सतपाल बलूनी – हरक(सॉरी वे तो चले गए) ही साथ होते तो लोग इनसे अपने शिकवे करने के बहाने ही सही बाहर तो आते। ऐसे ही चौबट्टाखाल में हुआ। न जाने क्यों बीजेपी के रणनीतिकार अपनी नैया खुद डुबोने में लगे हैं। बागियों को मनाने का यदि सिस्मेटिक प्रयास होता तो शायद हालत काबू में होते। मीडिया मैनेजमेंट वाले भी “माल” “हलाल” करने को पतीला चढ़ाए बैठे हैं। खैर, अभी भी देर नहीं हुई है। “60 पार छोड़िए 30 पार” पर ही तमीज से काम कर लो भाजपाइयों!! अन्यथा बाद में गाते फिरोगे, खुद ही हम डूबे हैं, विपक्ष में कहां दम था!!!!

 

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