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हिमालय क्षेत्र में सिलक्यारा सुरंग हादसे से सबक…

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✍🏿निशीथ जोशी

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में केंद्र सरकार की अति महत्वाकांक्षी ब्रह्मखाल-यमुनोत्री राजमार्ग पर निर्माणाधीन सिलक्यारा सुरंग परियोजना में मलबा गिरने से 17 दिन कैद हो कर रह गए 41 श्रमिकों के सकुशल जीवित निकल आने से देश और दुनिया भर के करोड़ों लोगों ने राहत की सांस ली है। जिस समर्पण और कुशलता के साथ इस पूरे बचाव अभियान को सफलता तक पहुंचाया गया वह काबिले तारीफ है। इसके बावजूद इस पूरे प्रकरण ने बहुत से सवाल भी खड़े किए हैं और सबक भी दिया है। जिनके उत्तर भी खोजने ही होंगे । भविष्य में सभी निर्माणाधीन योजनाओं में आने वाली संभावित आपदा की स्थिति में मानव जीवन को कैसे सुरक्षित खतरे से बाहर निकाला जा सके इसकी योजना बना कर पूरी व्यवस्था बनानी पड़ेगी।

चारधाम मार्ग पर बन रही साढ़े चार किलोमीटर लंबी यह सुरंग आध्यात्मिक और धार्मिक पर्यटन के साथ ही सामरिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। चारधाम यात्रा मार्ग पर निर्माणाधीन यह सुरंग लगभग 900 किलोमीटर लंबी सड़क परियोजना का एक हिस्सा है। जो सभी मौसम में केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री के लिए यात्रा करने वाले पर्यटकों प्रशस्त करेगी। आपात स्थिति में यह हमारी सेना के लिए भी चीन सीमा तक त्वरित गति से पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करने का सड़क मार्ग खोल देगी। इसकी लागत लगभग 900 करोड़ रुपए है।

सिलक्यारा सुरंग हादसे में मानव जीवन बचाओ अभियान की जितनी भी तारीफ की जाए वह कम होगी। जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस बचाव अभियान का फीडबैक ले रहे थे। सीएम धामी भी पूरे बचाव अभियान को मॉनिटर कर रहे थे। धामी ने कुछ दिनों तक अपनी टीम के साथ वहाँ कैंप किया। व्यक्तिगत रूप से एक एक जानकारी ली। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी घटनास्थल पर पहुंचे । विभाग के केंद्रीय राज्य मंत्री वी के सिंह श्रमिकों को बाहर निकाले जाने तक वहां कैंप कर जरूरी संसाधन उपलब्ध कराते में अपना योगदान देते रहे। यह सब आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में भारत में हुए अब तक के सबसे लंबी अवधि के सफल बचाव अभियान की मिसाल बन गई है।

यहां सवाल उठता है कि यदि केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने टनल के निर्माण के समय अंतरराष्ट्रीय मानकों के मानदंडों का कड़ाई से पालन किया होता तो सुरंग में करने वाले श्रमिकों और उत्तराखंड राज्य को इतनी बड़ी आपदा में इतने लंबे समय तक नहीं फंसे रहना पड़ता। नियमों के मुताबिक जब भी तीन किलोमीटर से लंबी सुरंग का निर्माण हो तो उसमें “एस्केप पैसेज” बनाना जरूरी होता है। यह हर 375 मीटर पर मुख्य टनल से जुड़ा होना चाहिए ताकि आपदा की स्थिति में सुरंग में फंसे लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके। टेंडर लेने वाली कंपनी को किसी स्वतंत्र कंपनी से इसका सेफ्टी और वित्तीय ऑडिट कराते रहना चाहिए। बिना ऑडिट रिपोर्ट की क्लीयरेंस के आगे निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए। यह जांच का विषय है कि इन मानकों का पालन सिलक्यारा टनल निर्माण करने वाली कंपनी ने किया था या नहीं। फिलहाल टनल में दीपावली की सुबह 12 नवंबर को मलबा गिरने के बाद जब 41 मजदूर अंदर कैद हो गए तो पता चला कि एस्केप पैसेज बनाया ही नहीं गया था। ऐसा क्यों हुआ? मंत्रालय और विभाग से जुड़े लोगों ने इसकी अनदेखी क्यों, किसके इशारे और दबाव में की इन सब सवालों का उत्तर तो ढूंढना ही पड़ेगा।

जब हादसा हुआ तो मीडिया सहित तमाम लोगों ने पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन के लिए सुरंग निर्माण पर ही सवाल खड़े कर दिए। जियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रॉक मैकेनिक्स के पूर्व निदेशक पी सी नवानी का कहना है कि पहाड़ों पर सुरंग सर्वाधिक सुरक्षित विकल्प है । एक बार निर्माण के बाद इसकी उम्र 100 साल तक की होती है। उत्तराखंड में यह कोई पहली टनल दुर्घटना नहीं थी। हाल के वर्षों में 7 फरवरी 2021 को चमोली जिले में रैणी क्षेत्र में ऋषि गंगा में निर्माणाधीन तपोवन विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना में अचानक आई बाढ़ से उत्पन्न आपदा में 105 लोगों के शव मिले थे। 204 लापता हो गए थे। सन 2004 में टिहरी बांध परियोजना में भी टी-3 सुरंग धंसने से 29 लोग दफन हो गए थे। इसके पूर्व में भी ऐसी परिस्थितियों से हिमालय का यह पर्वतीय क्षेत्र जूझता रहा है।

सिलक्यारा टनल हादसा इसलिए भी शोध का विषय है, क्योंकि यह बचाव अभियान के लिए तकनीक, मानवश्रम और ईश्वरीय आस्था के साथ टीमवर्क का जीवंत उदाहरण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सुरंग में फंसे सभी श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लेने के बाद ऐसे ही उद्गार व्यक्त किए। इस पूरे बचाव अभियान में जिस तरह से प्रधानमंत्री कार्यालय ने सूचना मिलते ही सक्रियता दिखाई वह भी उच्च स्तर पर मानवीय प्राणों को बचाने के लिए किए गए युद्ध स्तरीय प्रबंधन का प्रमाण है। पीएम के प्रधान सचिव पी के मिश्रा ने पीएम को सूचित करने के बाद उनके निर्देश पर पीएमओ के उप सचिव मंगेश घिल्डियाल को सिलक्यारा भेजा। पीएम के पूर्व सलाहकार भास्कर खुल्बे भी वहां पहुंच कर दिन प्रतिदिन की जानकारी पीएमओ को देते रहे। तमाम बचाव एजेंसियों का जोड़ा गया। आधुनिकतम तकनीक, संचार माध्यमों, मशीनों का संचालन कर रहे तकनीशियनों, दिशा निर्देश दे रहे विशेषज्ञों, उस पर पूरी सतर्कता और समर्पण के साथ बचाव अभियान को अंजाम तक पहुंचाने वाले श्रमिकों की भूमिका भी किसी देवता जैसी रही।

सुरंग बनाने के लिए जिस बाबा बौखनाग के मंदिर को हटा दिया गया था। बचाव अभियान में बड़ी बाधा आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों की सलाह पर छोटे से मंदिर का निर्माण किया गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, केंद्रीय राज्य मंत्री वी के सिंह, परियोजना से जुड़े अधिकारियों यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया से आए टनल एक्सपर्ट अर्नाल्ड डिक्स ने वहां पूजा अर्चना की। उसने यह भी प्रमाणित किया कि चाहे पूरब हो या पश्चिम पूरे विश्व में इस तरह के निर्माण कार्य में विज्ञान के साथ आध्यात्म और ईश्वरीय शक्ति के प्रति उनका विश्वास बना रहता है। अब यहां बौखनाग के बड़े मंदिर निर्माण की घोषणा भी कर दी गई है। अर्नाल्ड डिक्स ने तो सभी श्रमिकों के सकुशल जीवित निकल आने के बाद भी स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिल कर बाबा बौखनाग मंदिर पर माथा टेका और आभार जताया। यह सुरंग निर्माण से लेकर बचाव अभियान में जुटे हर व्यक्ति और देश दुनिया के लिए अद्भुत अनुभव रहा है। कुल मिला कर इस घटना से भविष्य में बनने वाली परियोजनाओं के लिए सबक लेकर सुधार करने का सबक मिला है। उत्तराखण्ड के मुख्य मंत्री धामी ने इसका संज्ञान लेते हुए 28 नवंबर 2023 को ही देहरादून में ग्राफिक एरा विश्वविधालय में आयोजित चार दिन की विश्व आपदा प्रबंधन कांग्रेस का उद्घाटन करते समय ही हिमालय क्षेत्र में जोखिम न्यूनीकरण के लिए राज्य में ही “राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान” स्थापित करने की घोषणा भी कर दी है। इस कार्यक्रम में 50 से अधिक देशों के विशेषज्ञ और वैज्ञानिक शामिल हुए हैं। आने वाले समय में देश और दुनिया के लिए यह बहुत मददगार साबित होगा। इस घटना ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आपदा प्रबंधन के साथ ही बचाव अभियान के कुशल निर्देशन के लिए नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसकी बहुत तारीफ की है। (फेसबुक वॉल से)

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