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… मैं अपनी जटा से देश की रक्षा में लगे सैनिकों के जूते साफ करना चाहता हूं..


✍🏿कुमार अतुल की कलम से मां कात्यायनी के आराधक बाबा नागपाल जी की अद्भुत कहानी

नवरात्रों की धूमधाम है। पूरे देश में चैत्र नवरात्रों पर व्रत, पूजा-पाठ विभिन्न आयोजन होते हैं। कर्मकाँडों से हम इस शक्ति पर्व को रुग्ण बना देते हैं। इस मौके पर मुझे दिल्ली के छतरपुर मंदिर के संस्थापक ब्रह्मलीन बाबा नागपाल बरबस ही याद आते हैं। उनके बारे में तरह-तरह के किस्से मशहूर थे। अकिंचन थे लेकिन अरबों-खरबों का छतरपुर मंदिर बनवा दिया। कई लोग कहते थे कि उनके पास लोहे से सोना बनाने की विधि थी। बहरहाल इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह जरूर था कि बाबा बिना किसी डिग्री के इतने बड़े आर्कीटेक्ट थे कि खुद छतरपुर और उससे संबंधित सारे मंदिरों का नक्शा खुद तैयार किया था। दुर्गा के छठे रूप अर्थात मां कात्यायनी के आराधक थे। उनका हुलिया बताते चलें। नागा बाबा थे, लेकिन कमर के नीचे छोटी सी लंगोटी पहनते थे। रंग आबनूसी काला। त्वचा में गजब की चमक। आंखों में परिस्थितियों के हिसाब से भाव। कभी आग्नेय तो कभी मातृवत्सला। और हां बाबा बीमार चल रहे थे। नाकों में आक्सीजन की नली लगी हुई थी। इस हाल में भी बाबा लोगों से मिल रहे थे और आशीर्वाद दे रहे थे।

साल 97 की चैत्र अश्टमी रही होगी। छतरपुर मंदिर में नवरात्रों में कितनी भीड़ होती है वहां जाकर ही समझा जा सकता है। मैं कभी बाबा से मिला नहीं था। मुझे धर्म बीट कवर करने वाले एक पत्रकार मित्र बाबा से मिलवाने ले गए। अनेक नौकरशाह, मंत्री-संत्री बाबा नागपाल के भक्त थे। बाबा से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पता नहीं बाबा को क्या सूझी कि उन्होंने हमें सबसे पहले बुलवाया। मित्र ने बाबा से परिचय करवाया। बाबा बड़ी विनम्रता से मिले।

बाबा ने बात शुरू की ही थी कि मंदिर के एक सेवक ने बाबा के कमरे में प्रवेश किया और हड़बड़ी में बोले बाहर दिल्ली के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना इंतजार कर रहे हैं। हमने सोचा बाबा अब हमें विदा करेंगे, लेकिन बाबा सेवक पर भड़क उठे। कहा मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री देखता नहीं मैं इन लोगों से बात कर रहा हूं। जबतक इनसे बात खत्म न हो दोबारा कमरे में मत आना। मैं आश्वस्त हुआ, कम से कम बाबा छोटे-बड़े में फर्क नहीं कर रहे। मैंने बाबा से पूछा कि हमें नवरात्रों पर क्या करना चाहिए। मैने सोचा बाबा पूजा-पाठ की बात करेंगे। बाबा की मुखमुद्रा बदल गई। उनकी आंखों से गंगा-जमुना बहने लगी। हम अवाक रह गए। इस शख्स को क्या हुआ जो अभी मुख्यमंत्री के आने की सूचना देने पर सेवक पर आगबबूला हो रहा था। आंखें छत की ओर टिक गईं।

बाबा ने फिर जो कहा हमने एक नागा साधू के मुंह से सुनने की कल्पना नहीं की थी। बाबा बोले- आपने भारत मां को देखा है? हमसे कोई जवाब देते नहीं बना। बाबा बोले- मैंने देखा है। भारत मां बहुत सुंदर है। उन्होंने कहा आप भारत घूमिए। उन्होंने टाइगर हिल और कन्या कुमारी का नाम लिया। कहा- वहां जाकर देखिए भारत मां कितनी सुंदर है। इसकी सुंदरता में कोई कमी न आने पाए हमारा प्रयास यही होना चाहिए।

मैंने कहा, बाबा नवरात्रों पर आप क्या संदेश देना चाहेंगे। इसके जवाब में बाबा ने जो कहा वह अदुभुत है। बाबा ने कहा कि बाबा नागपाल अपनी दाढ़ी के बाल से भारत मां की सीमाओं पर पहरा दे रहे प्रहरियों के जूते साफ करना चाहता है। हम दंग रह गए। हम बाबा को प्रणाम करके लौटे। जब मैं धार्मिक अवसरों पर धूर्तों, लंपटों और वाचालों को कर्मकांडों की वकालत करते पाता हूं तो बाबा नागपाल याद आ जाते हैं। काश इनमें कोई एक भी उन जैसा होता…(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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