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परंपराओं के नैरेटिव का रत्ना शाह फंडा

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✍🏿पार्थसारथि थपलियाल

इसी सप्ताह नागपंचमी का त्यौहार मनाया गया। सनातन संस्कृति को मानने वाले अनेक लोगों ने सर्पों की पूजा की, सांपों को दूध पिलाया। कहीं प्रतीकात्मक और कहीं वास्तविक। सावन में शिवजी का जलाभिषेक हो रहा है,, आनेवाले दिनों में रक्षा बंधन, हर छठ, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, बछ बारस, पितृ पक्ष, नवरात्रि दशहरा, दिवाली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पर्व आदि पर्व व त्यौहार आने वाले है। भारतीय संस्कृति में पर्वों और उत्सवों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही साथ ही सामाजिक महत्व भी है। हमारे पर्व व उत्सव जीवन की एकरसता को तोड़ते हैं विविधताओं से भर देते है। जीवन मे किसी के ऊपर कोई दबाव नही है कि ऐसा करो ही। धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य भी सकारात्मक ऊर्जा प्राप्ति की कामना करना है। वे भी मजहब की तरह लादे नही गए हैं।

हाल ही में एक बॉलीवुड कलाकार रत्ना पाठक शाह ने अपने एक इंटरव्यू में करवा चौथ को लेकर एक अवांछित चर्चा को जन्म दे दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे अपने पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ मनाती हैं तो उन्होंने कहा पागल हूँ मैं? 21वीं सदी की पढ़ी लिखी महिलाएं रूढ़ियों में फंसी हुई हैं। देश मे धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है। आदि आदि।

रत्ना पाठक सुप्रसिद्ध सिने कलाकार दीना पाठक की सुपुत्री और फ़िल्म अभिनेता नसीरूद्दीन शाह की दूसरी बेगम होने के बाद रत्ना पाठक शाह हुई हैं। कला का सम्मान करते हुए यह बताना भी जरूरी है कि दोनों ही उम्दा कलाकार हैं। लेकिन उम्दा कलाकार होने से वे नफरत की अधिकारी नही बन जाती हैं कि 21वीं सदी की पीढ़ी लिखी महिला करवा चौथ मना कर कट्टर हिन्दू बन रही हैं या रूढ़िवादी हैं। अगर सदी बदलने पर संस्कार बदल रहे हों तो अगली सदी में लोग अपनी बहन या भाई से विवाह कर लें? नसीरूद्दीन शाह से रत्ना पाठक शाह के दो पुत्र भी हैं। उनके नाम अरबी नाम हैं। रत्ना पाठक शाह को भारत में जन्मे अपने बेटों के नाम अरबी में ही रखने में रूढ़िवाद नही लगा। करवा चौथ मनाने वाली भारतीय महिलाओं को रूढ़िवादी (conservative) बताने वाली 20वीं सदी में जन्मी और 21वीं सदी में ज्ञान बांटने वाली मोहतरमा को उस समाज की रूढ़ियाँ नही दिखाई दी जहाँ एक महिला की आधी गवाही मानी जाती है और…..
कितनी ही कुप्रथाएं व्याप्त हैं। नसीरुद्दीन शाह ने भी ऐसा ही गयं पल था। यह सामाजिक परंपराओं को प्रभावित करने का नया नैरेटिव है। रत्ना पाठक शाह समय से बहुत आगे दौड़ चुकी हैं। भारत का समाज अपनी परंपरा और आधुनिकता को साथ मे लेकर चल रहा है, तो किसी को पीड़ा क्यों हो?

क्या अपने तीज त्यौहार मनाना दकियानूसी खयाल है। उनकी नज़र में भारतीय महिलाओं का दमन हो रहा है। पढ़े लिखे समाज में भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। 1835 में जब मैकॉले ने भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के लिए इंडिया एक्ट 1835 पास करवाया उस समय भारत मे 7 लाख 32 हज़ार गुरुकुलों के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। रत्ना जी को मालूम होना चाहिए कि आदिगुरु शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य शास्त्रार्थ के समय निर्णायक की भूमिका निभाने वाली विदुषी प्रकांड विद्वान मंडन मिश्र की पत्नी भारती थी। माता अनुसूया, जिन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को अपना दुग्धपान करवा दिया था। रानी प्रभावती, रानी दिद्दा, रानी कर्मावती, रानी दुर्गावती, रानी अहिल्याबाई होलकर,रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी गाई देनल्यू, इसी देश में सत्ता को संभाले हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन की वीर नारियों को भी याद कर लें। भारत की नारियां चूड़ी और तलवार का सौंदर्य एक साथ निभाती रही हैं। शिव और शक्ति का मिलन ही अर्धनारीश्वर बनाता है। न कोई छोटा न बड़ा। नये दौर में स्त्री और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं। फिर रूढिबादिता क्या है? प्रश्न सदैव वे लोग करते हैं जिन्हें संस्कृति का ज्ञान नही है।

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