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हिंदी पखवाड़ा: ध्वनि को चिन्ह रूप में निखारती देवनागरी


✍🏿पार्थसारथि थपलियाल

(14 सितंबर 1949 को भारतीय सांविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। संविधान में लिखा गया कि भारत की राजभाषा हिंदी होगी, जिसकी लिपि देवनागरी होगी। हिंदी दिवस पर इस लिपि के विभिन्न पहलुओं पर अवलोकन करने का प्रयास इस श्रृंखला में है। आप सभी को हिंदी दिवस पर शुभकामनाएं)

मानव सभ्यता के अरुणोदयकाल से ही मानव अपने भाव, विचार और संवेदनाओं को व्यक्त करता रहा है,। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए मानव ने सांकेतिक भाषा, मौखिक भाषा और फिर लिखित भाषा का अविष्कार किया। सम्पूर्ण विश्व में जहाँ जिज्ञासाएं और उद्यमिता एक दूसरे की पूरक बनी और उन्होंने पाया कि सांकेतिक भाषा के लिए आवश्यक था प्रकट संकेतों के अर्थ, संकेत देने वाला और देखने वाला समान रूप से समझते हों। उनसे सांकेतिक बात की जा सकती थी। संकेत भाषा की यह कमी होती है कि संकेत हटाते ही बात समाप्त। इसी प्रकार मौखिक भाषा भी समान भाषिक लोगों के मध्य एक भावों और विचारों का सेतु बनता है इसकी भी कमी यह कि बोलते ही ध्वनि खत्म होते ही प्रमाण भी खत्म हो जाता। भावों और विचारों को संरक्षित करने की मानवीय आवश्यकता ने लिपि को जन्म दिया। भाषा का पहला काम समझ पैदा करना है। भाषा मे जिन ध्वनियों को एक अलग चिन्ह के रूप में लिखा गया वे ध्वनि चिन्ह भाषाओं में उपयोग में लाये गए।

विश्व मे यूं तो लगभग सात हजार भाषाएं बोली जाती हैं सभी भाषाओं की लिपियाँ विविधताओं को लिए हुए हैं। भारत मे लगभग 1665 बोलियां/भाषाएं बोली जाती हैं। उनमें देवनागरी, गुरुमुखी, बांग्ला, गुजराती, मलयालम, कन्नड़, तमिल, तेलगु आदि लिपियाँ है कुछ भाषाओं की मूल लिपियाँ हैं। लेकिन देवनागरी लिपि संस्कृत भाषा, हिंदी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मागधी, गढवाली, कुमाउनी, जौनसारी, मराठी, आदि अनेक भाषाओं को लिखने की लिपि है।

लिपियों के क्रमिक विकास में चित्रलिपि, सूत्रलिपि, प्रतीकात्मक लिपि, भावमूलक लिपि, भाव-ध्वनि मूलक लिपि, और ध्वनि मूलक लिपियाँ विकसित हुई। ध्वनि मूलक लपि में किसी ध्वनि के लिए जो चिन्ह निश्चित किये गए हैं वे हमेशा उसी भाव से देखे सुने, और पढ़े जाते हैं। ध्वनि मूलक लिपियों में देवनागरी लिपि और रोमन लिपि (लैटिन लिपि) प्रमुख हैं।

ध्वनि मूलक लिपि के भी दो भेद हैं-(1) आक्षरिक और (2) वर्णिक। देवनागरी लिपि को आक्षरिक और रोमन लिपि को वर्णिक लिपि कहा जाता है। देवनागरी लिपि ब्राह्मी लिपि का परिष्कृत रूप है। देवनागरी नाम पड़ने के 4-5 अस्पष्ट से कारण हैं, जो इस लेख का वांछित पक्ष भी नही है। लेटिन या रोमन लिपि भी मूलतः रोम के एक डिस्ट्रिक्ट को समर्पित नाम है। आक्षरिक लिपि में एक अक्षर की ध्वनि पहले से निर्धारित है। जिसमे स्वर और व्यंजन के चिन्ह स्वतंत्र रूप से हैं। यथा रा ध्वनि में र+आ को मिलाकर रा बनता है। जबकि रोमन लिपि में वॉवल का सहारा लिया जाता है। इस कारण रोमन लिपि को देवनागरी लिपि से सरल माना जाता है।

देवनागरी लिपि में 12 स्वर और 38 व्यंजनों के अलावा देशज ध्वनियां “ड़” “ढ़” और “ळ”, विदेशी ध्वनियां क़, ख़, ग़, ज़, फ़ और आयातित ध्वनि ऑ (कॉफी)। इस प्रकार हिंदी भाषा के लिए 58 ध्वनि चिन्ह हैं। यदि व्यंजनों की मात्राओं को भी जोड़ दिया जाय तो या संख्या और बढ़ जाती है। रोमन लिपि में पहले 21 ही ध्वनियों के वर्ण थे बढ़ते बढ़ते यह संख्या 26 हो गई। इनमें 5 वॉवल A, E, I, O, U विभिन्न शब्दों में मात्राओं का काम करते हैं। वर्णिक लिपि में राम लिखने के लिए RAM लिखा जाता है। देवनागरी लिपि में नासिक ध्वनियों के चिन्ह-अनुनासिक और अनुस्वार भी कठिनाई पैदा करते है। र ध्वनि के 4 रूप हैं, श, ष, स तीन प्रकार के स भी नए सीखनेवाले को भ्रम में डाल देते हैं। पंचम वर्ण अनुनासिक के चिन्ह भी भ्रम पैदा करते है। इसी प्रकार ज्ञा और ग्या ध्वनियां भी संशय उत्पन्न कर देते हैं।

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