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बदरीनाथ धाम के कपाट हुए शीतकाल के लिये बंद, अब नारायण घृत कम्बल में लक्ष्मी के साथ रहेंगे


20 नवंबर की शाम को बदरीनाथ धाम के कपाट शनिवार को पौराणिक परंपराओं के साथ शीतकाल के लिये बंद कर दिये गये हैं। इसके साथ ही चार धाम यात्रा भी समाप्त हो गई है। कपाट बंद होने के मौके पर करीब 4 हजार 366 भक्तों ने भगवान नारायण के दर्शन किये।

शनिवार को ब्रह्म मुहूर्त में बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलते ही मुख्य पुजारी रावल ईश्वर प्रसाद नम्बूदरी मंदिर के गर्भगृह भगवान नारायण की अभिषेक पूजाओं और पुष्प श्रृंगार की प्रक्रियाएं संपन्न की। इस दौरान रावल ईश्वर प्रसाद नम्बूदरी ने महिला वेष में माता लक्ष्मी की सखी के रुप में गर्भ में प्रवेश किया। जिसके बाद यहां माता लक्ष्मी को भगवान नारायण के सांनिध्य में विराजमान कर पूजा-अर्चना की गई। यहां पौरणिक परम्पराओं के अनुरुप पूरे दिन मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खुले रहे। शाम 4 बजे मंदिर के कपाट बंद होने की प्रक्रियांएं शुरु की गई। मुख्य पुजारी रावल ने मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश कर माणा गांव की सुहागिन महिलाओं द्वारा ऊन से बनाए गए घृत कम्बल भगवान नारायण को ओढ़ाया। यहां करीब 1 घंटे तक चली विशेष पूजाओं के पश्चात निर्धारत 6 बजकर 45 मिनट पर मंदिर के कपाट शीतकाल के लिये बंद कर दिये गये। मंदिर के कपाट बंद होने के साथ ही उद्धव जी और कुबेर जी व आदि गुरु शंकराचार्य गद्दी को श्रद्धालुओं के साथ मंदिर परिसर से बाहर लाया गया। इस दौरान देवस्थानम बोर्ड के अपर कार्याधिकारी बीडी सिंह, धर्माधिकारी भुवन उनियाल, नगर पंचायत अधिशासी अधिकारी सुनील पुरोहित, सहित मंदिर समिति के अधिकारी-कर्मचारी, हक-हकूकधारी आदि मौजूद थे।

अब छह माह तक भगवान नारायण की पूजा करेंगे देवता : बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने के बाद हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतकाल के लिये धाम में मानवीय आवाजाही बंद हो जाती है। जिसके बाद यहां छह माह तक यहां भगवान नारायण की पूजा-अर्चना का जिम्मा देवताओं का होता है। जबकि योगध्यान बदरी मंदिर पांडुकेश्वर व नृसिंह मंदिर में भगवान नारायण, उद्धव जी, कुबेर जी व शंकराचार्य गद्दी की शीतकालीन पूजाएं की जाती हैं।

क्या है घृत कम्बल : बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने के दौरान माणा गांव की कन्याओं और सुहागिन महिलाओं द्वारा घृत कम्बल का निर्माण किया जाता है। जिसे कपाट बंद होने से पूर्व मुख्य पुजारी रावल द्वारा भगवान बदरी विशाल को ओढा दिया जाता है। जिसके बाद कपाट खुलने की प्रक्रिया के दौरान इस कम्बल को तीर्थयात्रियों को प्रसाद के रुप मे वितरित किया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार माणा गांव की कन्याओं और महिलाओं द्वारा कार्तिक माह में पंचाग गणना के आधार पर शुभ दिन निर्धारित कर इसे बनुकर तैयार किया जाता है। जिसके बाद ग्रामीण महिलाओं द्वारा इस कम्बल को इसी माह में बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के सौंप दिया जाता है। जिसके बाद कपाट बंद होने से पूर्व मुख्य पुजारी रावल द्वारा घृत कंबल पर घी व केसर को लेप लगाकर भगवान को ओढाये जाने की परम्परा है।

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