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गढ़वाली कुमाऊनी भाषा की समृद्धि की दिशा में कार्य किया जाना चाहिए : कठैत


✍🏿अनसूया प्रसाद मलासी
कवि चंद्रकुँवर बर्तवाल की रचनाओं का गढ़वाली में अनुवाद के बाद उनकी रचनाओं के कविता पोस्टर बनाकर प्रसिद्धि पाने वाले नरेंद्र कठैत आकाशवाणी पौडी़ में कार्यरत हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं और कई सम्मान भी उनके हिस्से में हैं। विगत सप्ताह अगस्त्यमुनि में उनसे इस संबंध में हुई बातचीत के अंश :-

प्र. – गढ़वाली-कुमाऊँनी भाषाओं के सम्मिश्रण या यूँ कहें कि एकीकरण ‘उत्तराखंडी प्रतिनिधि भाषा’ की बात सामने आ रही है। भाषा के इस सम्मिश्रण को किस अर्थ में लेंगे?
कठैत – गढ़वाली-कुमाऊँनी हमारी मातृभाषाएं हैं। प्रश्न विचारणीय है कि यदि मां के पास चप्पलें नहीं हैं या उसके पास फटी पुरानी धोती है, लाचार है, तो क्या मां, मां न रहेगी। गढ़वाली, कुमाऊँनी भाषा राज्य का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं कर सकती?
एक दौर वह भी था, जब गढ़वाल की सीमा सहारनपुर तक थी। लेकिन बाद में वह टिहरी तक सिमट कर रह गई। तो क्या उससे गढ़वाली भाषा का दायरा कम हुआ? राज्य की सीमाएं घट-बढ़ सकती हैं लेकिन उसके आधार पर भाषा का सीमांकन नहीं किया जा सकता। भाषाएं प्रयोगशालाओं, कारखानों में निर्मित नहीं होती। प्रतिनिधि भाषा अर्थात् कुछ गढ़वाली कुछ कुमाऊँनी। वह भाषा जन भागीदारी नहीं, बल्कि जन भावनाओं के विपरित खड़ी होगी। फिर भी यदि प्रयासरत हैं तो कोई आपत्ति भी नहीं। गढ़वाली कुमाऊँनी फिर भी रहेगी। क्योंकि ये मातृभाषाएं हैं हमारी। ये वे भाषाएं हैं, जो न चौरासी करों की मार से दबी, न बिरही की बाढ़ में बही और न इकावनी-बावनी के अकाल में मरी। हर एक झंझावात से जूझने का मादा रखती हैं गढ़वाली कुमाऊनी। इस्पाती रीढ़ है हमारी भाषाओं की।


प्र. – गढ़वाली कुमाऊँनी को आठवीं अनुसूची में रखने के संबंध में विचार –
कठैत
:- आठवीं अनुसूची से अधिक महत्वपूर्ण भाषा के रखरखाव और संवर्धन की आवश्यकता है। काम होगा तो अगली पीढ़ियां भी आठवीं अनुसूची के लिए प्रयास कर सकती हैं।

प्र.- राज्य की अन्य भाषाओं के संबंध में क्या राय है?
कठैत :- गढ़वाली और कुमाऊँनी उत्तराखंड राज्य की दो प्रमुख ही नहीं, अपितु समृद्ध भाषाएं हैं। जौनसारी,रवांल्टा अन्य भाषाएं सह भाषाएं हैं।
-प्र- भाषाओं को बचाने के क्या प्रयास होने चाहिए?
कठैत:- भाषाएं जन साधारण के बीच ढलती हैं और जन साधारण के प्रयास से ही सुरक्षित भी रहती हैं। धाद, कुमगढ, हलन्त, युगवाणी, रन्त रैबार, पहरू इत्यादि ने अपने पृष्ठ दिल खोलकर रखे हैं। कला, साहित्य संस्कृति के निमित्त संस्थाएं भी सक्रिय हैं। राज्य स्तर के शोध संस्थान और पुस्तकालय निमार्ण में सहयोग के लिए सामूहिक भूमिका अपेक्षित है।

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